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Saturday, February 13, 2010

दाँत काटी रोटी

बात है एक मेरी परिचिता "सेंगर आंटी" और उनकी सहेली "विजया चाची"|  दोनों की आपस में बहुत बनती थी , जिसे हिंदी की एक उक्ति में कहते है "दाँत काटी रोटी" | मतलब यूँ की अधिकतर "रोटी" बनती थी विजया चाची के घर और "काटने" जाती थी   सेंगर आंटी| सेंगर  आंटी के ५ बच्चे थे , पति एक सिपाही और शराबी और जुआरी था | जो हर माह बच्चों की फीस से जुआ खेलता था | खाने का शौकीन वह आदमी नॉनवेज पार्टी का भी गुलाम था चाहे घर में भर पेट अन्न न हो | तब सेंगर आंटी ने अपनी राम कहानी विजया चाची को सुनकर उनका ह्रदय द्रवित कर दिया | विजया चाची एक स्थापित कपड़ों की दुकान की मालकिन थी सो अपने आर्थिक फैसले खुद करने में माहिर | अब वे आये गये समय सेंगर आंटी की मदद कर दिया करती | चाहे मामला स्कूल-फीस का हो या उनके घर का सिलेंडर ख़त्म हो गया हो| या फिर उन्हें किसी दिन रुपयों की जरूरत पड़ जाती या फिर किसी कोई बड़ी चीज बाज़ार से विजया चाची की साख पर उधार लेना हो| फिर चाहे लेनदार विजया चाची को "सुनाकर" चला जाता | मै हमेशा विजया चाची से पूछा करती कि आप कैसे अपने घर से पैसे काट कर किसी कि इतनी मदद कर सकते है, अगर आप यही पैसे खुद बचाएं तो ये आप के ही काम आयेगें| तब विजया चाची ने वही पारम्परिक जबाब दिया  "वेदिका जब हम किसी कि आड़े वक्त में मदद करेगें तो हमारे आड़े वक्त में वह भी हमारे काम आता है| मै सुनकर चुप रह जाती और ये भी कह पाती कि अब वो समय नहीं रहा कि इन्सान ही इन्सान के काम आये| अब तो "बचत" इन्सान के काम आती है| जिन्दगी और रात-दिन लगातार चल रहे थे, खैर...... 

फिर एक दूसरी उक्ति का भी वक्त आया "समय हमेशा एक सा नहीं रहता |" विजया चाची की खूबसूरत बेटी "कार्तिका" के साथ दुर्घटना हुयी और इस वजह से वह चलने में असमर्थ होगयी | विजया चाची ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया लेकिन वह पूरे तीन  वर्षों तक अपनी बेटी को सहेज नहीं पायीं | विजया चाची और उनका पूरा परिवार कार्तिका के साथ सकारात्मक रास्ते की ओर जूझ रहा था , लेकिन कभी कभी "भाग्य" नाम की अडचन बिना शरमाये उस रास्ते में खड़ी हो जाया करती है सो हो गयी | विजया चाची आर्थिक और कई तरह से असहाय हो गयी | उस दौरान एक दिन अचानक सेंगर आंटी ने विजया चाची के घर आना जाना बंद कर दिया | कुछ समय बाद मुझे सेंगर आंटी ने बताया की कार्तिका को कुछ ऊपरी चक्कर है, इसलिए उनके घर में आने-जाने से, उनके साथ उठने बैठने से, और साथ खाने से वह साया हम पर भी आ सकता है इसलिए समझदारी इसी में है की अपना बचाव करने के लिए उन से नाता तोड़ दिया जाये | और वैसे भी जब उनके ख़ानदान और रिश्तेदार उनसे मुंह मोड़ रहे है तो हम उनके है ही कौन  !!!!!!

4 comments:

  1. अब बचत ही काम आती है.....मेरे साथ हाथ कंगन को आरसी क्या वाली बात है....खैर आहिस्ता आहिस्ता आपने खरी-खरी और सच्ची बात कह दी है..लाख टके की बात है..इन्सानी फितरत यही हो गई है वेदिकाजी...इस पोस्ट के लिए क्या कहुं....अत्यंत बेहतर

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  2. इन्हीं घटनाओं को देख सुन मानव मन सेवाभाव से दूर होता जा रहा है.

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  3. समझ में नही आता की इतनी प्रगति के बाद भी आज के भारत में ये सब बराबर देखने को मिल जाती है...बढ़िया सामयिक चर्चा...धन्यवाद वेदिका जी

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  4. ये दुनिया है और इस दुनिया में हर प्रकार के लोग बसतें है
    इन्सान को अनुभव और घटनाओं से शिक्षा लेनी चाहिए

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