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Monday, February 1, 2010

एक दिन

मै हमेशा से चाहती थी कुछ बातें उन अपनों से बताना जो उनके लिए मेरे बहाने से सार्थक साबित हो, ये सार्थकता कभी एक अनुभव हो तो कभी मनोरंजन , कभी समय व्यतीत होने की साम्रगी हो तो कभी कोई मर्म-स्पर्शी बात | इसी सन्दर्भ में अपनी कुछ बातें आप लोगो से कहना चाहूगी |

" एक दिन मै बैंक गयी थी अपने काम को निपटा कर वापस ही लौट रही थी की मेरी एक परिचिता मुझे मिली और उन्होंने अपने काम के लिए मुझसे पेन माँगा | शिष्टचार के नाते मैंने उन्हें अपना कीमती और उपहार में मिला हुआ पेन दे दिया | उन्होंने लेते हुए एक मुसकान दी  और अपना काम ख़त्म करके वह पेन द्वारपाल को दे दिया | मै जब तक वहीं रुकी रही तो मेरे तरफ देखते हुए उन्होंने कहा -
"अरे वेदिका  तुम अभी तक गयीं नहीं ? "
" नहीं " मै अपने उस पेन को वापस लेने के लिए रुकी हूँ जो आप ले गयी थी " मैंने उत्तर दिया | "
ओह " उन्होंने प्रतिउत्तर देते हुए कहा  "उस पेन में ऐसा क्या खास है ? " तो मैंने हल्के गुस्से में कहा कि  
" कि वो मेरा पेन है साथ ही बेशकीमती भी " |
तब उन्होंने जो उत्तर दिया उसके बाद मेरे  पास कुछ भी कहने को नहीं बचा , और वो उत्तर था  
" इतना ही कीमती था तो यहाँ क्यों लायीं थी ? "

2 comments:

  1. हिन्दी चिट्ठाजगत में स्वागत है।

    लगता है कि आप हिन्दी फीड एग्रगेटर के साथ पंजीकृत नहीं हैं यदि यह सच है तो उनके साथ अपने चिट्ठे को अवश्य पंजीकृत करा लें। बहुत से लोग आपके लेखों का आनन्द ले पायेंगे। हिन्दी फीड एग्रगेटर की सूची यहां है।

    कृपया वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें। यह न केवल मेरी उम्र के लोगों को तंग करता है पर लोगों को टिप्पणी करने से भी हतोत्साहित करता है। आप चाहें तो इसकी जगह कमेंट मॉडरेशन का विकल्प ले लें।

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