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Saturday, March 16, 2013

'फलों का टोकरा '

https://www.facebook.com/gitika.vedika/notes
जितेन की पत्नी देविका गर्भवती थी, वह समय आने ही वाला था की नन्ही जिन्दगी संसार में अवतरित होती। इस समय देविका को सबके सहयोग की जरुरत थी चाहे सासू माँ थी, या ननद रांची यानि की जितेन जी की बहन जो की शादीशुदा थी। गर्भवती होने के बावजूद देविका सारे कर्तव्य उतनी ही तत्परता से निभाती थी, इसके बाद भी न तो वह सास की प्रिय बहू बन सकी,  न नन्द की अच्छी भाभी और न ही इस योग्य उसे जितेन जी समझते थे की इस अवस्था में तो कम से कम उसका स्वाभिमान बचाते जो हर वक्त उनकी माँ और बहन रांची हनन करते रहते थे।
फिर भी देविका खुश रहती थी अपने आने वाले शिशु के स्वागत के लिए। उसेअचानक सुबह चार बजे प्रसव पीड़ा होने लगी किन्तु भाग्य कहिये या लापरवाही जितेन जी ने ना तो उसे डॉक्टर के पास ले जाना सही समझा न ही जननी सुरक्षा गाड़ी को बुलाया, और नन्हा सा शिशु दुनिया में अचानक आगया और बिना रोये ही एक पल में उसी  ईश्वर के पास वापस भी चला गया। देविका का सब कुछ झटके ही ख़त्म हो गया, प्रेक्टिकल जितेन जी दूसरे दिन से बिजनेस में लग गये क्योकि  उनके अनुसार तो "जाने वाला तो चला गया "।
रांची के अनुसार "वो तो ऐसा ही होना था देविका भाभी के साथ, उनको तो उनके कर्मों का फल मिलना था सो मिल गया, मेरे भाई पर हक जमाने की कोशिश करती थी न। अवाक् सी रह गयी देविका और सोचने लगी अगर मेरे एक बच्चे के जाने से मुझे मेरे कर्मों का एक फल मिला है तो क्या रांची दीदी को क्या वो फलों का टोकरा मिला था जब उनके एक के बाद एक छह बच्चे पैदा हो कर संसार से चले गये थे !!!! 
                                                                                                                   गीतिका  'वेदिका'
                                                             ७ मार्च २०१३ १ १०:०० अपरान्ह   

Thursday, May 6, 2010


सूने से मन आंगन में मेरे
ये कौन रंगोली उकेर गया....

पतझर तो था अभी-अभी
फिर कौन बहार बिखेर गया...

अपना तो नही था, झौंका
शायद माथे हाथ फेर गया....

लौट आये वो लम्हा देखूं
जो पहले कुछ देर गया ....

"साभार" वेदिका जी

Sunday, March 7, 2010

अजीब शब्दों के चयन वाले व्यक्ति

आज क्यूँ न कोई ऐसी बात आप लोगों को बताऊँ जिसमें से मै खुद गुजरी हूँ| काफी दिन हुए, पास के घर में इक दीदी रहा करती थी| मुझे सम्मान भी देती थी और  वापस भी ले लिया करती  थी| कई बार उनके इम्तेहान के दिनों में मैंने उनके लिए रात में  जाग कर चाय बनायीं| उनके लिए अपना काम दरकिनार कर उनके काम से गयी| कई बार उनके श्रीमुख से ऐसे वचन सुने की नही लिख सकती यहाँ| दीदी मुझे जब भी याद करती थीं मै उन तक पहुच जाती थी कि उन्हें तकलीफ न हो  और तो और उनकी कुछेक परेशानियाँ मेरे परिवार ने भी सहीं, सिर्फ इसलिए ही की उन को मैंने अपनी "दीदी" कहा था|

इक दिन मुझे अचानक से लगा कि दीदी मुझे देख कर न देखने की कोशिश करती है, अब मुस्कराती भी नहीं, और अगर मै  मुस्कराने की पहल करती तो वे मुझे खुद में ही लज्जित करा देती थी| ये भी बता दूँ की "दीदी" के अपने गृह-नगर लौटने के दिन करीब थे| और मुझसे सम्बन्धित सारे काम ख़त्म हो चुके थे या अब मेरी  उपयोगिता उनके पास नहीं रही.....हाँ तो ; मैंने सोचा की मै अपने अनुमान लगाने की बजाये खुद उन्ही से पूँछ लूँ कि मुझसे ऐसी क्या गलती हो गयी है.......तो दीदी ने कहा "मेरे थोड़े से दिन और यहाँ बचे है, तुम यहाँ रहो और मुझे भी रहने दो"| फिर कुछ दिन बाद मुझे उन्होंने सही बात बताई- "वेदिका तुम्हारे शब्द इतने अजीब होते है कि मुझे समझ नही आते, तुम इतनी कठिनता से जीवन जीती हो तो मुझे परेशानी होती है| मै सुनकर हतप्रभ रह गयी, फिर मैंने ये सोच कर चैन की सांस ली कि कोई तो ऐसा है मेरे जिन्दगी में, जिसके मापदंड "चोरी करने वाले व्यक्ति, झूठ बोलने वाले, ठगने वाले, जलन, ईर्ष्यालु, राग द्वेष, कटुता, अभिमानी, लोभी" आदि विकारों वाले व्यक्ति न होकर   "अजीब शब्दों के चयन वाले व्यक्ति" है|

चलते -चलते यह भी स्पष्ट कर दूँ कि मै किसी भी बात को बिना किसी भूमिका के, सीधे और सरल लहजे में बोलती हूँ, इस बात का ध्यान रखते हुए कि मेरे शब्द किसी को भूले से भी ठेस न लगा दें|

Friday, February 19, 2010

आख़िरकार सफल माँ

विगत सप्ताह इक विवाह सम्पन्न हुआ| काफी परेशानियों से टकराकर इक अकेली माँ ने अपनी सुंदर और गुणवान बेटी के लिए घर ढूंढा| दैवयोग से वही सज्जन इस विवाह में भी पधारे जिनकी चर्चा मैंने "थीम अच्छी है" पोस्ट पर की है| लड़का काफी अच्छा था, हर दृष्टि से, जिम्मे दार और उसी जाति में लेकिन उप-वर्ग दूसरा था| उसकी "आख़िरकार सफल माँ"  को ये वचन सुना दिए गये| कि केवल दूसरे उप-वर्ग में होने कि वजह से कोई कदम नहीं उठा रहा हूँ, अगर दूसरी जाति में वर होता तो मै आसमान सर पर उठा लेता| लडकी कि माँ ने उस समय तो धैर्य रखा| बाद में मुझे व्यक्तिगत रूप से मुखातिब होते हुए बोली "वेदिका  जब मेरी सायानी बेटी के वर के लिए कोई आगे नही आया तो अगर मै अंतरजातीय विवाह करा देती तो भी क्या बुरा होता, और सच तो ये है कि अगर ये आसमान भी सर पर उठा लेते तो मै इनसे कहती श्रीमान जी आप राह नापिए, मै मेरी बेटी कि शादी जाति से नहीं इन्सान से कर रही हूँ|"
मै उनके सामने नतमस्तक हो गयी जो स्त्री, और प्रौढ़, होकर भी किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रसित नही थीं| दुःख हुआ तो केवल इस बात का कि उनके शुभ-मंगल कार्य में इक अदना आदमी उन्हें मानसिक रूप से उनको आहत कर गया| और न जाने क्यों वे उसे प्रतिउत्तर न दे पायीं| शायद वे अपनी बेटी के विवाह से इतनी खुश थीं कि ये बात उनके ह्रदय को कचोट न सकी| ईश्वर उन्हें हमेशा खुश रखे|

थीम अच्छी है

पिछले दिनों इक अतिथि घर पर आये| वे बचपन से ही मुझे या मेरे साथ वालों को किसी लायक नहीं समझते| लेकिन वे अपने घर की बेटियों को बहुत अच्छी सोच का, समझते है| चाहे उनकी बेटियां किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचे| बात हो रही थी इक फिल्म के बारे में "my name is khan" तो मुझसे पूंछा गया की क्या है इस फिल्म में ? मैंने कहा "थीम अच्छी है" तो मुझे तुरंत लौट के जबाब मिला "थीम अच्छी चाहिए तो "श्रवण कुमार , हरिश्चंद्र" पढो| मै अवाक् रह गयी| ये वही इन्सान थे जिनकी माँ दर-ब-दर परेशान होती रही| उनकी मृत्यु बहुत बुरे हालातों में हुयी| लेकिन यदि उनकी बेटियों ने कोई भी टिप्पणी दी होती तो उसे वो जरुर उत्साहित करते| मै समझ नही पाती हूँ उनको कभी|  मेरे ख्याल से कोई भी वैश्विक विषय व्यर्थ नहीं है| अगर हम किसी विषय की चर्चा करते है तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं की हम दूसरे विषयों की अवहेलना कर रहे है|

कई साल पहले वे हमारे घर पधारे, मेरी माँ ने उन्हें बताया की "मेरी बेटी बहुत अच्छी कवितायेँ लिखती है| बोले दिखाओ , तो मैंने दस कवितायेँ थमा दी| बोले और है की इतनी ही ? मैंने ४५ पन्ने दे दिए| बोले अगर १०० होती तो इक किताब निकलवाते| मैंने तुरंत इक कलेक्शन उन्हें थमा दिया जिसमें १२२ कवितायेँ थी| उन्होंने उसे १० मिनिट पढ़ा और बोले "लो रख लो"| इक भी शब्द प्रोत्साहन का उनकी जिव्हा पर नहीं आया|क्या चाहते थे वो ??????मैंने वापस अपने कागज़ रख लिए| 

जब भी वो मेरे घर  आते है, ऐसा कुछ जरुर बोलते हैं की मेरा आत्मसम्मान आहत होता है| पिछले दिनों मैंने उन्हें अपना ब्लॉग दिखाया तो "इन सब कामों में क्या रखा है"? मै समझ नहीं पाती की उन्हें क्या जबाब दूँ? क्योकि मै उनके साथ साथ अपने माता-पिता का भी सम्मान रखना चाहती हूँ जिनके बुलावे पर वह आते है

मै स्पष्ट कर दूँ ये सज्जन मुझे ३० वर्ष वरिष्ठ है|

Saturday, February 13, 2010

दाँत काटी रोटी

बात है एक मेरी परिचिता "सेंगर आंटी" और उनकी सहेली "विजया चाची"|  दोनों की आपस में बहुत बनती थी , जिसे हिंदी की एक उक्ति में कहते है "दाँत काटी रोटी" | मतलब यूँ की अधिकतर "रोटी" बनती थी विजया चाची के घर और "काटने" जाती थी   सेंगर आंटी| सेंगर  आंटी के ५ बच्चे थे , पति एक सिपाही और शराबी और जुआरी था | जो हर माह बच्चों की फीस से जुआ खेलता था | खाने का शौकीन वह आदमी नॉनवेज पार्टी का भी गुलाम था चाहे घर में भर पेट अन्न न हो | तब सेंगर आंटी ने अपनी राम कहानी विजया चाची को सुनकर उनका ह्रदय द्रवित कर दिया | विजया चाची एक स्थापित कपड़ों की दुकान की मालकिन थी सो अपने आर्थिक फैसले खुद करने में माहिर | अब वे आये गये समय सेंगर आंटी की मदद कर दिया करती | चाहे मामला स्कूल-फीस का हो या उनके घर का सिलेंडर ख़त्म हो गया हो| या फिर उन्हें किसी दिन रुपयों की जरूरत पड़ जाती या फिर किसी कोई बड़ी चीज बाज़ार से विजया चाची की साख पर उधार लेना हो| फिर चाहे लेनदार विजया चाची को "सुनाकर" चला जाता | मै हमेशा विजया चाची से पूछा करती कि आप कैसे अपने घर से पैसे काट कर किसी कि इतनी मदद कर सकते है, अगर आप यही पैसे खुद बचाएं तो ये आप के ही काम आयेगें| तब विजया चाची ने वही पारम्परिक जबाब दिया  "वेदिका जब हम किसी कि आड़े वक्त में मदद करेगें तो हमारे आड़े वक्त में वह भी हमारे काम आता है| मै सुनकर चुप रह जाती और ये भी कह पाती कि अब वो समय नहीं रहा कि इन्सान ही इन्सान के काम आये| अब तो "बचत" इन्सान के काम आती है| जिन्दगी और रात-दिन लगातार चल रहे थे, खैर...... 

फिर एक दूसरी उक्ति का भी वक्त आया "समय हमेशा एक सा नहीं रहता |" विजया चाची की खूबसूरत बेटी "कार्तिका" के साथ दुर्घटना हुयी और इस वजह से वह चलने में असमर्थ होगयी | विजया चाची ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया लेकिन वह पूरे तीन  वर्षों तक अपनी बेटी को सहेज नहीं पायीं | विजया चाची और उनका पूरा परिवार कार्तिका के साथ सकारात्मक रास्ते की ओर जूझ रहा था , लेकिन कभी कभी "भाग्य" नाम की अडचन बिना शरमाये उस रास्ते में खड़ी हो जाया करती है सो हो गयी | विजया चाची आर्थिक और कई तरह से असहाय हो गयी | उस दौरान एक दिन अचानक सेंगर आंटी ने विजया चाची के घर आना जाना बंद कर दिया | कुछ समय बाद मुझे सेंगर आंटी ने बताया की कार्तिका को कुछ ऊपरी चक्कर है, इसलिए उनके घर में आने-जाने से, उनके साथ उठने बैठने से, और साथ खाने से वह साया हम पर भी आ सकता है इसलिए समझदारी इसी में है की अपना बचाव करने के लिए उन से नाता तोड़ दिया जाये | और वैसे भी जब उनके ख़ानदान और रिश्तेदार उनसे मुंह मोड़ रहे है तो हम उनके है ही कौन  !!!!!!

Wednesday, February 3, 2010

दाँत-दर्द...

आजकल मै दाँत-दर्द से परेशान हूँ| इसी सिलसिले में  डॉक्टर  को अपनी आपबीती सुनाने गयी   डॉक्टर  ने बहुत प्यार से सारी बात सुनी और मुझे उस कुर्सी पर बैठने को कहा जिसका रंग तो गुलाबी था लेकिन पास में एक मशीनों का गुच्छा था| गुलाबी  रंग  की परवाह करते हुए मै बैठ तो गयी लेकिन मशीनों को देखते हुए डर लगा  लेकिन मुझे जल्दी ही आश्वस्त करा दिया गया कि वे मेरे भले के लिए है| मुझे विश्वास हो गया कि वे  " दीवार खोदने वाली मशीनों की दिखने वाली चीजों "  में  मेरी भलाई छुपी है| 
जल्द ही डॉक्टर साहिबा  ने मुझे इंजेक्शन लगा कर दर्द की उस जड़ को समूल उखाड़ फेंका जिसे मै कीड़े वाला दाँत कहती थी|  दवाई लगा कर मै घर आ गयी|  इंजेक्शन के कारण मेरा सूजा हुआ मुंह मेरे घर के लोगों के लिए हंसी का सबब बना लेकिन मै उनके साथ नहीं हंस सकी क्योंकि मेरे हसने के औजार घायल थे| जिस कारण मैं ईर्ष्यालु भी कहलाई गयी क्योंकि मै अपने लोगों की ख़ुशी में शरीक नहीं थी | लेकिन मेरा दोष तो कतई नहीं माना जा सकता , क्योकि मेरे अलावा और भी लोग होते होंगे जो दूसरों की खुशी में नही शामिल होते होंगे  वैसे भी कलियुग का जमाना है , खैर .....! इन सब के बाद मैंने इन लोगों से बदला भी लिया वो भी इस तरह की मैंने इन सब लोगों के साथ चटपटा मसाले - दार खाना न खाकर अपना सीधा सा सादा सा नमक और घी मिला हुआ सात्विक दलिया खाया|

ओह ! इन सब बातों के कुचक्र में पड़ कर एक प्रमुख बात तो बताना ही भूल गयी |  हुआ ये दाँत उखाड़ने के बात डॉक्टर साहिबा ने हिदायत दी थी " वेदिका जी कभी भी कोई दाँत नही उखाड़वाइयेगा , दांतों  की जड़े कमजोर होती है "

                                                                                          - वेदिका

Monday, February 1, 2010

एक दिन

मै हमेशा से चाहती थी कुछ बातें उन अपनों से बताना जो उनके लिए मेरे बहाने से सार्थक साबित हो, ये सार्थकता कभी एक अनुभव हो तो कभी मनोरंजन , कभी समय व्यतीत होने की साम्रगी हो तो कभी कोई मर्म-स्पर्शी बात | इसी सन्दर्भ में अपनी कुछ बातें आप लोगो से कहना चाहूगी |

" एक दिन मै बैंक गयी थी अपने काम को निपटा कर वापस ही लौट रही थी की मेरी एक परिचिता मुझे मिली और उन्होंने अपने काम के लिए मुझसे पेन माँगा | शिष्टचार के नाते मैंने उन्हें अपना कीमती और उपहार में मिला हुआ पेन दे दिया | उन्होंने लेते हुए एक मुसकान दी  और अपना काम ख़त्म करके वह पेन द्वारपाल को दे दिया | मै जब तक वहीं रुकी रही तो मेरे तरफ देखते हुए उन्होंने कहा -
"अरे वेदिका  तुम अभी तक गयीं नहीं ? "
" नहीं " मै अपने उस पेन को वापस लेने के लिए रुकी हूँ जो आप ले गयी थी " मैंने उत्तर दिया | "
ओह " उन्होंने प्रतिउत्तर देते हुए कहा  "उस पेन में ऐसा क्या खास है ? " तो मैंने हल्के गुस्से में कहा कि  
" कि वो मेरा पेन है साथ ही बेशकीमती भी " |
तब उन्होंने जो उत्तर दिया उसके बाद मेरे  पास कुछ भी कहने को नहीं बचा , और वो उत्तर था  
" इतना ही कीमती था तो यहाँ क्यों लायीं थी ? "